गणपति अथर्वशीर्ष

​॥ श्री गणपति अथर्वशीर्ष ॥ (अर्थ सहित)​
​शान्ति मन्त्र
​श्लोक:
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥
​हिंदी अर्थ:
हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें। यज्ञ करने वाले हम अपनी आंखों से शुभ और पवित्र चीजें देखें। हमारे अंग और शरीर स्थिर (स्वस्थ) हों, जिससे हम आपकी स्तुति करते हुए देवताओं द्वारा निर्धारित की गई पूरी आयु का आनंद ले सकें।
​मुख्य पाठ (अथर्वशीर्ष आरम्भ)
​श्लोक १:
ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥


​हिंदी अर्थ:
[हे भगवान गणेश! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष रूप से परम तत्व हैं। आप ही इस संसार को बनाने वाले (कर्ता) हैं। आप ही इसका पालन करने वाले (धर्ता) हैं और आप ही इसका संहार करने वाले (हर्ता) हैं। निश्चित रूप से यह संपूर्ण संसार आप ही का रूप (ब्रह्म) है। आप ही नित्य साक्षात आत्मा हैं।]

श्लोक २:
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥

हिंदी अर्थ:
[मैं न्यायसंगत और सत्य बात कह रहा हूं। मैं पूर्ण सत्य बोल रहा हूं।]

श्लोक ३:
अव त्वं माम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवानूचानमव शिष्यम्। अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्। अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥
​[हिंदी अर्थ:
हे गणेश जी! आप मेरी (रक्षा) करें। बोलने वाले (वक्ता) की रक्षा करें, सुनने वाले (श्रोता) की रक्षा करें, दान देने वाले और ज्ञान को धारण करने वाले की रक्षा करें। आचार्य (गुरु) और शिष्य की रक्षा करें। पीछे से, सामने से, उत्तर से, दक्षिण से, ऊपर से और नीचे से… सभी दिशाओं से आप मेरी पूरी तरह रक्षा करें।]

स्वरूप और तत्व (गणेश जी का वास्तविक रूप)

श्लोक ४:
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥

हिंदी अर्थ:
[आप ही संपूर्ण वाणी (वाङ्मय) हैं और आप ही चेतना (चिन्मय) हैं। आप ही आनंदस्वरूप हैं और आप ही ब्रह्मस्वरूप हैं। आप सच्चिदानन्द (सत्य, चित्त और आनंद) के रूप में अद्वितीय (एकमात्र) हैं। आप साक्षात प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप साक्षात ज्ञान और परम विज्ञान के भंडार हैं।]

​स्वरूप और सृष्टि (गणेश जी की शक्ति)

श्लोक ५:
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥

हिंदी अर्थ:
[यह संपूर्ण संसार आप ही से उत्पन्न होता है। यह सारा संसार आप ही के सहारे टिका हुआ है। यह संपूर्ण संसार (प्रलय काल में) आप ही में विलीन हो जाता है और आप ही में लौट आता है। आप ही भूमि (पृथ्वी), आप (जल), अनल (अग्नि), अनिल (वायु) और नभ (आकाश) हैं। वाणी के जो चार रूप (परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी) हैं, वे भी आप ही हैं।]

श्लोक ६:
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं अवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥


​हिंदी अर्थ:
[आप तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे हैं। आप तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे हैं। आप तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) से परे हैं। आप तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) से परे हैं। आप मनुष्यों के मूलाधार चक्र में हमेशा निवास करते हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रिया—ये तीनों शक्तियां आप ही हैं। योगीजन सदा आपका ही ध्यान करते हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र (शिव), इंद्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चंद्रमा हैं। भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक और ॐकार भी आप ही हैं।]

गणेश गायत्री और मूल मंत्र (तन्त्र स्वरूप)
​श्लोक ७:
गण आदिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्। अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण रुद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः सन्धानम्। संहिता सन्धिः। सैषा गणेशविद्या॥

हिंदी अर्थ:
[पहले ‘गण’ शब्द के पहले अक्षर (ग) का उच्चारण करें, फिर वर्णों के आदि अक्षर ‘अ’ को जोड़ें। उसके बाद अनुस्वार (ं) लगाएं, जो अर्धचंद्र से सुशोभित हो। इसके आगे ‘ॐ’ (तारक मंत्र) लगा देने से आपके ‘गम’ (गं) मंत्र का स्वरूप बनता है। इसमें ‘ग’ पूर्वरूप है, ‘अ’ मध्यमरूप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्यरूप है और ‘बिन्दु’ उत्तररूप है। नाद संधान है और संहिता संधि है। यही परम पवित्र ‘गणेश विद्या’ (गणेश मंत्र) है।]

श्लोक ८:
गणकाय ऋषिः। निचृद्गायत्री छन्दः। श्रीमन्महागणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः॥

हिंदी अर्थ:
[इस गणेश विद्या के ऋषि ‘गणक’ हैं, इसका छंद ‘निचृद्गायत्री’ है और इसके देवता ‘श्रीमन्महागणपति’ हैं। इनका मूल मंत्र है— “ॐ गं गणपतये नमः” (इस मंत्र का जाप करना चाहिए)।]

श्लोक ९:
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात॥
​हिंदी अर्थ (गणेश गायत्री मंत्र):

हिंदी अर्थ :

[हम उन एकदन्त (एक दांत वाले) भगवान को जानते हैं और उन वक्रतुण्ड (टेढ़ी सूंड वाले) का हम ध्यान करते हैं। वे हाथी के समान मुख वाले प्रभु हमें सद्बुद्धि की ओर प्रेरित करें (हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर चलाएं)।]


​गणेश जी का ध्यान (रूप वर्णन)
​श्लोक १०:
एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्। रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्। भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥

​हिंदी अर्थ:
[जो एक दांत वाले और चार हाथों वाले हैं; जिन्होंने अपने हाथों में पाश, अंकुश, (टूटा हुआ) दांत और वरद मुद्रा (आशीर्वाद देने वाला हाथ) धारण की हुई है; जिनके ध्वज पर चूहा (मूषक) अंकित है; जो लाल रंग के हैं, बड़े पेट (लम्बोदर) वाले हैं, जिनके कान सूप जैसे बड़े हैं और जो लाल वस्त्र धारण करते हैं; जिनके शरीर पर लाल चंदन का लेप लगा है और जिनकी पूजा लाल फूलों से की जाती है; जो अपने भक्तों पर दया करने वाले, संसार के मूल कारण और कभी नष्ट न होने वाले देव हैं; जो सृष्टि की शुरुआत में प्रकृति और पुरुष से भी परे प्रकट हुए थे—ऐसे गणेश जी का जो व्यक्ति रोज़ ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ माना जाता है।]


​फलश्रुति (पाठ करने के चमत्कारी लाभ)
​श्लोक ११:
नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्ते अस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥

​हिंदी अर्थ:
[देवों के समूह के नायक को नमस्कार, गणों के स्वामी को नमस्कार, शिवजी के प्रमथ गणों के अध्यक्ष को नमस्कार। बड़े पेट वाले, एक दांत वाले, विघ्नों का नाश करने वाले, भगवान शिव के पुत्र और मनोवांछित वरदान देने वाले साक्षात वरदमूर्ति गणेश जी को बार-बार नमस्कार है।]

श्लोक १२:
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते। स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। स सर्वतः सुखमेधते। स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते॥

हिंदी अर्थ:
[जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह ब्रह्म रूप हो जाता है (परम पद को प्राप्त करता है)। उसे किसी भी प्रकार की बाधा या विघ्न परेशान नहीं करते। वह सब ओर से सुख प्राप्त करता है और जाने-अनजाने में हुए पांचों महापापों (बड़े पापों) से मुक्त हो जाता है।]


​श्लोक १३:
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायंप्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति। धर्ममर्थं कामं मोक्षं च विन्दति॥


​हिंदी अर्थ:
[शाम के समय इसका पाठ करने से दिनभर में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। सुबह के समय पाठ करने से रात में हुए पाप दूर हो जाते हैं। जो सुबह और शाम दोनों समय पाठ करता है, वह निष्पाप हो जाता है। हर जगह (या हमेशा) पाठ करने से मनुष्य विघ्न-बाधाओं से मुक्त रहता है और उसे धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष (चारों पुरुषार्थ) की प्राप्ति होती है।]

हवन की महिमा, विशेष मनोकामना पूर्ति के उपाय और
​विभिन्न सामग्रियों से हवन करने का फल (विशेष उपाय)

श्लोक १४:
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥

हिंदी अर्थ:
इस परम पवित्र अथर्वशीर्ष को ऐसे व्यक्ति (शिष्य) को नहीं देना चाहिए जिसमें श्रद्धा न हो। जो कोई भी मोहवश (बिना पात्रता देखे) इसे किसी को देता है, वह पाप का भागी बनता है। जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष के एक हजार (1000) पाठ करता है, वह इसके प्रभाव से अपनी हर मनोकामना सिद्ध कर लेता है।]

श्लोक १५:
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति। यः सामिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥


​हिंदी अर्थ:
[जो व्यक्ति एक हजार (1000) मोदकों (लड्डुओं) से गणेश जी का हवन (यज्ञ) करता है, उसे मनचाहा फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति समिधा (हवन की लकड़ियों) से यज्ञ करता है, उसे संसार की हर वस्तु और सफलता प्राप्त होती है।]

श्लोक १६:
यो दूर्वाङ्कुरैैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान् भवति॥


​हिंदी अर्थ:
[जो व्यक्ति दूर्वा (दूब घास) के अंकुरों से गणेश जी का हवन करता है, वह कुबेर के समान धनवान बन जाता है। जो व्यक्ति लाजा (धान की खील/मुरमुरे) से हवन करता है, वह यशस्वी (कीर्तिमान) बनता है और उसकी बुद्धि बहुत तेज (मेधावी) होती है।]


​विद्या और धन प्राप्ति के उपाय व समापन

श्लोक १७:
यो घृततैलेन यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति। स महाविघ्नात् प्रमुच्यते। स महादोषात् प्रमुच्यते। स महापापात् प्रमुच्यते। स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषत्॥


​हिंदी अर्थ:
[जो व्यक्ति घी और तेल से हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इस अथर्वशीर्ष को आठ (8) श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भली-भांति सिखाने या सुनाने से मनुष्य सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है। सूर्य ग्रहण के समय, किसी पवित्र बड़ी नदी के किनारे या भगवान गणेश की प्रतिमा के सामने इसका जाप करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। ऐसा सिद्ध पुरुष सभी बड़े विघ्नों, बड़े दोषों और महापापों से मुक्त हो जाता है। वह सब कुछ जानने वाला (सर्वज्ञ) बन जाता है। जो इस रहस्य को जानता है, वही सच्चा ज्ञानी है—यही यह उपनिषद कहता है।]


​॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ॥

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2 Responses

  1. हर्ष वर्धन दवे says:

    प्रणाम गुरुदेव 🙏🏻🙇🏻‍♂️
    चरण स्पर्श 🙏🏻🙇🏻‍♂️

    गुरुदेव और गणपति जी की कृपा बरसती रहे

    जय गणपति
    जय गुरुदेव
    🙏🏻🙇🏻‍♂️🙏🏻

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