गणपति कथा अंश

गणपती कथा अंश ब्रह्मा जी ने कहा – हे सत्यवती नन्दन! गणेश जी तो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवम महामहिम परात्पर ब्रह्मा है। शास्त्रों में उनके कई मंत्र उपलब्ध है।जो उनकी उपासना करने वाले भक्त है,। उनके दर्शन करने से भी समस्त विध्न नष्ट हो जाते है। एक बार शिवजी ने उनकी स्थापना विधि पर प्रकाश डाला था ,उसे मैं तुम्हारे प्रति कहता हूं । हे व्यास ! प्रात: काल शोचादि से निवृत्त हो कर पवित्र होकर पवित्र जल में स्नान करे और शुद्ध वस्त्र धारण करके श्रेष्ठ आसन पर पूर्वाभिमुख बैठ कर आचमन, प्राणायाम और मानस उपचार द्वारा पूजन करके प्रणव मंत्र के शीत अनुष्ठान विधि पूर्व करे। जब तक भगवान गजानन के स्वरूप के दर्शन हो जाय तब तक पूजा अखंड रूप से निरंतर चलता रहे। इस प्रकार की आराधना करने पर भगवान गणेश्वर अवश्य प्रसन्न हो जाते है ब्रह्मा जी से उपासना विधि सीखकर व्यास जी ने उन्हे प्रणाम किया और बोले ‘हे ब्रह्मन! गणेश जी का जप किस किस ने किया है और उसे क्या क्या सिद्धी प्राप्त हुई है जब ब्रह्मा जी कहते है की जब सृष्टि रचने का समय आया जब हमने गणेश जी की उपासना की ओर उनके निवेदन किया – हे गण के अध्यक्ष हे सर्वशक्तिमान प्रभो! मैं सृष्टि के विषय में कुछ भी नहीं जानता। उसे मेने कभी देखा तो क्या ,सुना भी नही । तब उसकी रचना कैसे कर पाऊंगा? गणेश्वर बोले – हे ब्रह्मा जी! सृष्टि का दर्शन करना है तो मेरे शरीर में विद्यमान अनंत ब्रह्मांड का अवलोकन करो। फिर तो मेरी कृपा से आप सहज रूप से ही सब कार्य करने लगोगे। हे मुने! यह कहकर उन्होंने मुझे दिव्य दृष्टि दी और फिर अपने श्वास के साथ भीतर खीच लिया। उनके उदर में पहुंच कर मैने अनंत ब्रह्मांड के दर्शन किए।वहा मेने समस्त जीवों के साथ स्वयं को, विष्णुजी को और शिव को भी देखा। जो दृश्य एक ब्रह्मांड में दिखाई दिया, वही अन्य ब्रह्मांड में भी देखे थे,जिससे मैं भ्रमित होकर गणेश जी की स्तुति करने लगा। तब गणेश जी ने मुझे अपने निश्वास से साथ बाहर निकाल दिया। बाहर आ कर मैने देखा तो कोई नही था। न विष्णु जी , न शिव और ना भगवान गणेश्वर ही। तब मैं सृष्टि रचना का संकल्प करने लगा। मुझे समस्त वेद शास्त्रों का स्वत: ज्ञान हो गया था। संसार में मेरे समान वेदज्ञ कोई था ही नही, इसीलिए सर्वत्र मेरी प्रशंसा होने लगी ,जिससे मन में बड़े भारी अभिमान की उत्पति हो गई बस, वह अभिमान मेरे कार्य में पूर्ण रूप से बाधक बन गया। सृष्टि रचना के समय अनेकानेक विध्न आ उपस्थित हुए। तब मैं गणेश्वर का ही ध्यान लगा और मैने उनकी स्तुति करते हुए केवल इतना ही कहा – प्रभो ! इस विपत्ति से उबारिए। हे गजानंद! मुझ पर कृपा कीजिए। तभी मैने आकाशवाणी सुनी – हे ब्रह्मा जी किसी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या करो। साथ ही,भगवान गणेश्वर का ध्यान और मंत्र जप भी करते रहो महऋषि भृगु ने राजा सोमकांत के प्रति कहा -राजन! तब ब्रह्मा जी ने व्यासदेव को बताया कि आकाशवाणी सुनने के पश्चात् मुझे एक स्वप्न दिखाई दिया कि प्रलय में सब लीन हो जाने पर भी केवल एक विशाल वट वृक्ष ही शेष बचा खड़ा है। उस वृक्ष के एक पत्र पर कोई बहुत छोटा बालक लेता हुआ है। मैने ध्यान से देखा तो उसका रूप भगवान विनायक देव के ही समान था।उसके दर्शन कर मुझे बड़ा आनंद हुआ और मैं पुन: मंत्र का जप करने लगा। हे मुनि! तभी मैने देखा कि वह बालक धीरे धीरे मेरे पास आ गया है ।उसने कहा -हे चतुरानंद ! समस्त चिंताओं को त्याग कर मेरे मंत्र का जप करो। जब जप का अनुष्ठान पूर्ण होने पर आप मेरा साक्षात दर्शन करोगे। बस यह सुखद स्वप्न देख कर मेरा ध्यान खुल गया। व्यास ! फिर मैने उस मंत्र का जपानुष्ठान आरंभ किया ।जिस प्रकार भी संभव हुआ, मैने उन आदिदेव को पुर्ण प्रसन्न करने का प्रयास किया। अनुष्ठान पूर्ण होने पर मुझे भगवान गणेश्वर के साक्षात दर्शन हुए। उनके अत्यंत तेजस्वी और विलक्षण रूप के समक्ष मेरे नेत्रों में चकाचोध भर गई और स्मृति भी नष्ट हो गई। उसी समय मेरे कानो में भगवान गणेश्वर की गंभीर वाणी सुनाई दी हे! ब्रह्मा ! हमने आपको दर्शन का का वचन दिया वो पूरा किया। आप वर मांगो। हे मुने ! मैने गजानन भगवान को प्रणाम कर निवेदन किया – प्रभो ! कार्य में उपस्थित अभी विध्न दूर हो जाय और मुझे शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हो जिससे मैं आपके गुणानुवाद में भी समर्थ हो सकूं, इस पर गणेश जी ‘ तथास्तु ‘ कह कर अंतर्धान हो गए। महर्षि भृगु बोले – हे राजन्! भगवान गणाध्यक्ष के अदृश्य हो जाने पर ब्रह्मा जी ने सर्ग रचना का आरंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने मरी च्यादि चौदह मानस पुत्रों उत्पन किए और उन्हें आज्ञा दी की वो सृष्टि रचो। किंतु उन्होंने अति तपस्वी और अति ज्ञानी होने के कारण ब्रह्मा जी के आज्ञा पर ध्यान नहीं दिया। फिर विवश हो कर चतुर्मुख ने स्वय ही सृष्टि की रचना की ओर निश्चित हो कर प्रभु चिंतन करने लगे। इस प्रकार ब्रह्मा जी को सर्ग रचना में जो सफलता प्राप्त हुई, उसका पूर्ण श्रेय भगवान गणेश्वर जी की उपासना का ही है।

admin

Mantra gyan

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *