आप और आपके गुरु
आप और आपके गुरु अध्यात्म और तंत्र मार्ग में गुरु की महिमा व परम आवश्यकता
सनातन संस्कृति में ‘गुरु’ केवल एक व्यक्ति, शिक्षक या मार्गदर्शक नहीं हैं, बल्कि गुरु एक शाश्वत ‘तत्व’ हैं। संसार के सारे रिश्ते जहां शरीर और कर्मों से बंधे होते हैं, वहीं गुरु और शिष्य का रिश्ता सीधे आत्मा का परमात्मा से जुड़ाव होता है। अध्यात्म और विशेषकर तंत्र मार्ग में, बिना गुरु के गति संभव ही नहीं है।
गुरु तत्व का वास्तविक रहस्य क्या है और क्यों गुरु के बिना साधना का कोई भी मंत्र नहीं खुलता।
अंधकार से खींचकर ज्ञान के परम प्रकाश की ओर ले जाए, वही साक्षात गुरु है। गुरु वह चेतना हैं जो शिष्य के भीतर सोई हुई है वह मंत्र द्वारा दिव्य शक्तियो को जगाकर उसे वीर भाव और दिव्य भाव में प्रवेश करवा आत्म-साक्षात्कार के योग्य बनाती हैं।
तंत्र और साधना मार्ग में गुरु की अपरिहार्यता है
साधारण शिक्षा किताबों से ली जा सकती है, लेकिन तंत्र और आंतरिक साधना एक अत्यंत गूढ विषय है। इस मार्ग में बिना मार्गदर्शक के चलना आत्मघाती है।
1. गुरु ही हैं ऊर्जा के नियंत्रक
तांत्रिक मंत्रों में और संध्या विधान होता है। जब एक साधक साधना शुरू करता है, तो उसके भीतर ऊर्जा का विस्फोट होता है। उस ऊर्जा को कब, कितना और किस दिशा में मोड़ना है, यह केवल एक समर्थ गुरु ही जानते हैं। गुरु शिष्य की क्षमता (पात्रता) को देखकर ही उसे दीक्षा और मंत्र प्रदान करते हैं।
2. कपाट खोलने वाली कुंजी
जैसा कि कहा गया है कि तंत्र के रहस्य बहुत गूढ़ हैं और बिना गुरु-शिष्य संबंध के कुछ नहीं खुलता। गुरु के पास ही वह ‘कुंजी’ होती है जो शिष्य को मंत्र द्वारा ईश्वर की अनुभूति करवाता है और शिष्य के बंधनों को खोल देती है। किताबें केवल विधि बता सकती हैं, लेकिन उस विधि में प्राण फूंकने का कार्य केवल गुरु ही करता है।
गुरु-शिष्य संबंध: पूर्ण समर्पण का मार्ग
गुरु और शिष्य का संबंध तब तक फलित नहीं होता, जब तक कि उसमें ‘पूर्ण समर्पण’ न हो। जब शिष्य अपनी बुद्धि, अपना अहंकार और अपने विचार पूरी तरह से गुरु के चरणों में विसर्जित कर देता है, तभी वह उस परम ज्ञान को ग्रहण करने के योग्य बनता है।
”जब शिष्य गुरु में उतर जाता है, तब गुरु शिष्य में प्रकट हो जाते हैं।”
अध्यात्म का नियम है कि जब तक भीतर का बर्तन खाली नहीं होगा, तब तक उसमें गुरु-कृपा का अमृत नहीं भरा जा सकता। शिष्य की व्याकुलता, उसकी तड़प ही गुरु को उसकी ओर खींचता है। गुरु शिष्य की परीक्षा भी लेते हैं, लेकिन वह परीक्षा उसे गिराने के लिए नहीं, बल्कि उसे कुंदन (शुद्ध सोना) बनाने के लिए होती है।साक्षात शिव का रूप हैं गुरु।
सब कुछ गुरु के चरणों से ही शुरू होता है और इष्ट के चरणों में जाकर विलीन हो जाता है।
कभी सोचना
अक्सर सवाल ये पूछा जाता है गुरु कैसा होता है?
लेकिन कभी ये सोचा शिष्य कैसा होना चाहिए?
कभी अपनी श्रद्धा पर सवाल किए? कितनी सच्ची है?
कभी अपने को परखा?
कभी ख़ुद 🫵 पर सवाल उठाए?
कभी ख़ुद 🫵 के भितर झांका
कभी ये सोचा आपने गुरु के लिए क्या किया
क्या आप अपने शिष्यत्व की कसौटी पर खरे उतरे हैं??? या नहीं??
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*गुरुदेव के चरणों में प्रणाम* 🔱🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙏🙏🙏🔱 अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी गुरुदेव
*गुरुदेव के चरणों में प्रणाम* 🔱🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙏🙏🙏🔱
*गुरुदेव की जय हो 🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙇🏻♂️🙏🙏🙏🔱
Jai gurudev aapko charan vandan guru ji 🙏
सादर चरण स्पर्श गुरुदेव🙏🙏🙏
जय गुरुदेव