आत्मा – यानी – स्वयं
आत्मा – यानी – स्वयं को जानने की इच्छा सबको रहती है।
हर युग में हर पीढ़ी में ये जिज्ञासा हमेशा रही है और हर पीढ़ी में अपनी ओर से इसका समधान भी किया है
जिज्ञासा आज भी है प्रश्न आज भी हैं ज्ञान की यात्रा आज भी जारी है और हमेशा रहेगी भी
पहचान पाने की विधि और सिद्धी हर व्यक्ति को पूरी करनी पड़ती है ववसायिक स्तर पे इसका उत्पादन नही हो सकता
दूसरी बात यह भी है की ज्ञान का ऐसा स्तर है जहां विराट अति शून्य है और यही पूर्ण है यही सत्य है,प्रश्न व्यक्ति को नामांकित करते हैं जिज्ञासा सपाट मैदान से गुजरती है हर एक प्रश्न दिशा देते हैं कुछ को गलत कुछ को सही गति प्रदान करते हैं।
गुरु के संकेत ,संदेश आज्ञा शांत चित जब तक नही समझ पाओगे तब तक शांति नही मिल सकती और ना मार्ग मिल पाएगा और अशांत चित और मन विश्वस्त नही हो पाएगा।
अशोक भारद्वाज द्वारा
उपासना वास्तव में एक ऐसा विषय है जहां समय स्थिर हो जाया करता है और उस स्थिति में वृंदावन भी भी वहीं मिलता है और यह नित्य आनंद परन्तु हर व्यक्ति उस नित्य आनंद तक तब तक नहीं पहुंच सकता जब तक अविश्वास है
वास्तव में जितना विस्तार बाहर है उतना ही विस्तार अंदर है व्याकुलता इस लिए है की उसको पाने का तरीका नही जानते और अविश्वास उस डोर को तोड़ देता है और व्यक्ति भ्रम में पड़ा उधर उधर ही घूमता है
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