मन: एक बेलगाम घोड़ा या जीवन का सारथी?
मन: एक बेलगाम घोड़ा या जीवन का सारथी?
“मन ही घोड़ा है। हम वहीं-वहीं जाते हैं, जहाँ-जहाँ यह मन हमें ले जाता है। लगाम सही से न संभाली जाए, विवेकपूर्वक न चला जाए, तो यह अपनी मर्जी से चलता है।”
यह पंक्तियाँ मानव जीवन के सबसे बड़े और गहरे सत्य को उजागर करती हैं। सनातन चिंतन और उपनिषदों में भी मन की तुलना एक अत्यंत शक्तिशाली, चंचल और तीव्र गति से दौड़ने वाले घोड़े से की गई है। जैसे एक कुशल घुड़सवार एक शक्तिशाली घोड़े की पीठ पर बैठकर लंबी और दुर्गम दूरियों को आसानी से पार कर लेता है, ठीक वैसे ही यदि हम अपने मन को वश में कर लें, तो यह हमें जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा सकता है। परंतु, यदि घोड़ा बेलगाम हो जाए, तो वह घुड़सवार को किसी गहरी खाई या दलदल में गिराने में देर नहीं लगाता।
मन की अपार शक्ति और भटकाव
मन नाम का यह जो घोड़ा है, यह वास्तव में अद्भुत है, बड़े काम का है और इसकी गति तो प्रकाश से भी तेज है। एक क्षण में यह यहाँ है, और अगले ही क्षण ब्रह्मांड के किसी दूसरे कोने में पहुँच जाता है। इसकी इस तीव्र गति और शक्ति का लाभ हमें तभी मिल सकता है, जब इसकी दिशा ठीक हो।
समस्या तब शुरू होती है जब यह घोड़ा अपनी मर्जी से भागने लगता है। जहाँ इसे जाना चाहिए (यानी हमारी मंजिल, हमारे लक्ष्य की ओर), वहाँ न जाकर यह उन गलियों की ओर भागता है जहाँ क्षणिक सुख, वासना और भ्रम की चकाचौंध होती है। यदि हम इसके पीछे-पीछे बिना सोचे-समझे भागते रहे, तो अंततः परिणाम वही होता है जो उस लोक-कथा के अकुशल घुड़सवार का हुआ था, जिसका घोड़ा उसे उसकी मंजिल के बजाय एक गंदे नाले में ले जाकर पटक देता है।
जब दिशा बिगड़ती है: अपमान और दुखों का दलदल
जब मन की दिशा ठीक नहीं रहती, जब विवेक का अंकुश इस पर से हट जाता है, तो यह हमें परमात्मानन्द (सच्चे और शाश्वत आनंद) रूपी लक्ष्य से भटकाकर दुख, पाप और वासना के कीचड़ में ढकेल देता है।
सांसारिक जीवन में जब इंसान मन के विकारों के वश में होकर गलत कदम उठाता है, तो समाज में उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है। जैसा कि कहा गया है:
“तब पगड़ी तो उतर ही जाती है, मुंह अलग काला होता है।”
अर्थात, समाज में जो मान-सम्मान, प्रतिष्ठा (पगड़ी) इंसानों ने वर्षों की मेहनत से कमाई होती है, वह मन के एक गलत कौतुक के कारण पल भर में नष्ट हो जाती है। कलंक और अपयश का ऐसा काला रंग लगता है जिसे मिटाना असंभव हो जाता है।
माया का जाल और जनम-मरण का जुर्माना
यह भटकाव केवल इसी जन्म के लोक-अपवाद तक सीमित नहीं रहता। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो बेलगाम मन हमें इस संसार के सबसे बड़े कारागार—‘जगत में जन्म-मरण की कैद’—में डाल देता है। हम बार-बार अपनी अधूरी वासनाओं और इच्छाओं के कारण इस संसार में आते हैं, दुखों को भोगते हैं और फिर चले जाते हैं।
और इस पूरी प्रक्रिया में ‘माया’ हमसे बहुत कड़ा जुर्माना वसूलती है। माया हमें अपने इशारों पर कठपुतली की तरह नचाती है। कभी सुख का लालच देकर, कभी दुख का भय दिखाकर, वह हमें इस कदर भरमा देती है कि हम भूल ही जाते हैं कि हम इस संसार में किस परम लक्ष्य को पाने आए थे।
विवेक की लगाम: समाधान क्या है?
इस बेलगाम घोड़े को वश में करने का एकमात्र साधन है—विवेक और सजगता (Awareness)।
- लगाम को कसकर थामें: विवेक ही वह लगाम है जो मन को गलत दिशा में जाने से रोकती है। हर विचार और इच्छा के उठते ही खुद से पूछें—”क्या यह मुझे मेरे लक्ष्य की ओर ले जा रहा है या दलदल की ओर?”
- दिशा का निर्धारण: मन को यह मत कहिए कि वह शांत हो जाए, बल्कि उसे एक सही और सकारात्मक दिशा दे दीजिए। जब मन को ज्ञान, सेवा, रचनात्मकता या ईश्वरीय चेतना (परमात्मानन्द) का मार्ग मिल जाता है, तो वह स्वतः ही गलत रास्तों को छोड़ देता है।
- अभ्यास और वैराग्य: जैसा कि गीता में भी कहा गया है, चंचल मन को केवल निरंतर अभ्यास (Practice) और वैराग्य (Detachment) के द्वारा ही वश में किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मन कोई शत्रु नहीं है, यह हमारा सबसे बेहतरीन साधन और मित्र बन सकता है, बशर्ते शासन इसके हाथ में न होकर आपके आत्म-विवेक के हाथ में हो। यदि आप इस मन रूपी घोड़े को अपनी मंजिल के अनुकूल ढाल लेते हैं, यदि यह भी वहीं जाना चाहने लगे जहाँ हमारी वास्तविक मंजिल है, तो जीवन यात्रा बेहद सुगम और आनंदमयी हो जाती है।
अपनी लगाम को ढीला मत छोड़िए, विवेकपूर्वक चलिए, ताकि जीवन के इस सफर में आपकी पगड़ी भी सुरक्षित रहे, मुख पर आत्मिक तेज हो और आप माया के जुर्माने से बचकर उस परम आनंद को प्राप्त कर सकें जिसके लिए यह मानव जीवन मिला है।
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जी गुरुदेव🙏
सबसे दुष्कर कार्य है मन को साधना, यह नियन्त्रण में है तो सब कुछ संभव है
जय गणपति🚩
जय गुरुदेव🚩
🙏🏻🙇🏻♂️🙏🏻