तंत्र मे मेरे अनुभव

तंत्र मे मेरे अन्यभव गणपति और कृष्ण दोनों तांत्रिक संध्या विधान मे विपरीत हैँ। मेरे ईस्ट गणपति हैँ कृष्ण मेरी आत्मा के पिता, मुझे बरसो हो गए गणपति और कृष्ण सेवन करते हुए गणपति। भगवान गणपति ब्रह्म रूप सुख और हर वबस्था दाता हैँ किन्तु कृष्ण एक भाव, कृष्ण विषय मे चर्चा के बाद मन इतना व्याकुल हो जाता है मुख से शब्द ही बंध हो जाते हैँ और शरीर आत्मा व्याकुलता के कारण 2,3 घंटे ही निस्तेज हो जाती है।वास्तव मे कृष्ण प्रेम हैँ आत्मा को आध्यात्मिक लोक की सैर हाथ पकड़ के करवाते हैँ आत्म समोहन हो जाता है। तंत्र मे बहुत गूढ है लेकिन गुरु शिष्य संबंध बिन कुछ खुलता नही जब शिष्य समर्पण भाव से गुरु मे उत्तर जाता है तब तंत्र का गूढ खुलता है। वैसे तो बिन रोये मा भी बच्चे को दूध नही पिलाती और ज़ब बच्चा रोता है तो लाड़ से गोदी मे बैठा उसको पोंछती भी साफ भी करती है।

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​तंत्र साधना में गणपति और श्रीकृष्ण: एक साधक की आंतरिक व्याकुलता और गुरु का महत्व
​तंत्र शास्त्र और अध्यात्म की दुनिया जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही यह साधक के आंतरिक अनुभवों को झकझोरने वाली भी है। तंत्र संध्या विधान में कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जहाँ दो अलग-अलग दिव्य चेतनाएँ साधक के भीतर एक साथ काम करती हैं। तंत्र मार्ग में श्री गणेश (गणपति) और भगवान श्रीकृष्ण, दोनों का स्वरूप और साधक पर उनका प्रभाव बिल्कुल विपरीत और अनोखा दिखाई देता है।

आइए एक साधक के अंतर्मन की गहराई से इस गूढ़ रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं।
​गणपति और कृष्ण: तंत्र संध्या विधान के दो विपरीत ध्रुव
​तंत्र साधना के संध्या विधान में गणपति और श्रीकृष्ण की ऊर्जाएं दो अलग-अलग दिशाओं और अनुभूतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक तरफ जहाँ गणपति पूर्णतः आधार और स्थिरता हैं, वहीं श्रीकृष्ण परम आनंद और विसर्जन हैं।

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​1. ब्रह्म स्वरूप गणपति: सुख और व्यवस्था के दाता
​गणपति आदिदेव हैं, वे बुद्धि, विवेक और इस स्थूल जगत की संपूर्ण व्यवस्था के स्वामी हैं। वे साक्षात ‘ब्रह्म रूप’ हैं, जो साधक को जीवन में स्थिरता, ऋद्धि-सिद्धि, सुख और हर प्रकार की अनुकूल व्यवस्था प्रदान करते हैं। उनकी साधना से जीवन में एक अनुशासन, सुरक्षा और पूर्णता का बोध होता है। वे मार्ग के विघ्नों को हरकर साधक को संसार और तंत्र दोनों में स्थापित करते हैं।

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​2. श्रीकृष्ण: आत्मा के पिता और दिव्य भाव का समोहन
​इसके विपरीत, भगवान श्रीकृष्ण केवल एक नाम या रूप नहीं, बल्कि एक असीम ‘भाव’ हैं। वे आत्मा के परम पिता हैं। श्रीकृष्ण के विषय में चर्चा छिड़ते ही या उनका स्मरण करते ही, साधक का मन एक अत्यंत तीव्र व्याकुलता से भर जाता है। यह व्याकुलता कोई सांसारिक दुःख नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम है।
​इस कृष्ण-प्रेम की तीव्रता इतनी प्रचंड होती है कि:
​मुख से शब्द निकलना बंद हो जाते हैं और वाणी मौन हो जाती है।
​शरीर और आत्मा उस दिव्य व्याकुलता के कारण कुछ घंटों के लिए पूरी तरह निस्तेज (शांत और बाह्य चेतना से शून्य) हो जाते हैं।
​यह वास्तव में ‘आत्म-समोहन’ (Divine Hypnosis) की वह स्थिति है। जहाँ श्रीकृष्ण साधक का हाथ पकड़कर उसे इस भौतिक संसार से परे, दिव्य आध्यात्मिक लोकों की सैर कराते हैं। कृष्ण विशुद्ध प्रेम हैं, और उस प्रेम में साधक का अहंकार पूरी तरह गल जाता है।

​तंत्र का गूढ़ रहस्य: बिना गुरु कुछ नहीं खुलता

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​तंत्र मार्ग में कितनी ही विधाएं और रहस्य क्यों न छिपे हों, लेकिन यह एक शाश्वत सत्य है कि बिना गुरु और शिष्य के सच्चे संबंध के, तंत्र का कोई भी कपाट नहीं खुलता। Kyoki :-
​किताबें पढ़कर या केवल बौद्धिक विमर्श से तंत्र के गूढ़ रहस्यों को नहीं जाना जा सकता। तंत्र की असली कुंजी गुरु की कृपा में है। जब एक शिष्य पूर्ण समर्पण भाव से अपने अहंकार को त्यागकर गुरु के चरणों में विलीन हो जाता है, जब वह गुरु की चेतना में पूरी तरह उतर जाता है, तब गुरु उसके भीतर के बंधनों को खोलते हैं और तंत्र का वास्तविक रहस्य प्रकट होता है।
​”बिन रोए तो मां भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती।”
​अध्यात्म का यह नियम बहुत सीधा है। जब तक साधक के भीतर सत्य को पाने की वह तड़प, वह व्याकुलता और ‘रोने’ जैसी विकलता पैदा नहीं होती, तब तक प्रकृति या गुरु भी उसे वह गुप्त ज्ञान नहीं सौंपते। शिष्य की पात्रता और उसकी तीव्र पुकार ही गुरु-कृपा को खींचकर लाती है।
​निष्कर्ष: ज्ञान और प्रेम का अनूठा समन्वय
​गणपति जी की साधना जहाँ साधक को आधार, शक्ति और जीवन की सुव्यवस्थित व्यवस्था देती है, वहीं श्रीकृष्ण का भाव साधक को उस परम आनंद और मुक्ति की ओर ले जाता है जहाँ सिर्फ प्रेम बचता है। तंत्र की इस यात्रा को पूर्णता की ओर ले जाने का सामर्थ्य केवल एक सद्गुरु में ही होता है। जो शिष्य के समर्पण को देखकर उसके भीतर छिपे ब्रह्मांड के द्वार खोल देते हैं।

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Ashok sharma

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Mantra gyan

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7 Responses

  1. Mohan lal says:

    जब दोनों ही तांत्रिक संध्या में विपरीत है गुरुदेव तो सेवन दोनों का एक साथ कैसे🤔

  2. Yankesh Vyas says:

    जय गुरूदेव

  3. Aman hindu says:

    जय श्री राम 🛕

    हर हर महादेव 🛕

    दंडवत प्रणाम गुरुदेव 🙏🌹🙇

  4. Prabhat Kumar Mishra says:

    चरण स्पर्श गुरुदेव

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