गुरु का महत्व

तंत्र (अध्य्यातम )में गुरु का महत्व

मंन्त्र का उचारण मंन्त्र की शैली मंन्त्र की शब्दावली से होता है वह उचारण गुरु ठीक करवता है मंन्त्र जप करते हुए अनेको अनुभव होते हैं उन्ही के हिसाब से दिशा सही है या नही मंन्त्र मंन्त्र वर्किंग में ह या नही यह तय होता है।
कोनसे मंन्त्र साधना के लिए हैं कोनसे मंन्त्र प्रयोगिक होते हैं यह गुरु को पता होता है

अशोक भारद्वाज द्वारा लिखित

किसी भी पुस्तक में उत्कीलित मंन्त्र नही होते उत्कीलित मंन्त्र गुरु से मिलते हैं क्योंकि मंन्त्र गुरु परंपरा में ही चलते हैं पुस्तकीय मंन्त्र कोई काम के नही होते

कीलित मंन्त्र ,गलत उचारण,गलत मंन्त्र,पुस्तक से उठा के किये गए मन्त्र, यह सब नगेटिबिटी पैदा करते हैं

किसी के द्वारा खुद के नाम से बना के दिया गया मंन्त्र पूरा जीवन बेकार करता है गुरु मंन्त्र देवताओ के होते हैं प्रदत करता गुरु होता है

admin

Mantra gyan

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7 Responses

  1. जितेन्द्र झा 'गुड्डू' says:

    सादर चरण स्पर्श गुरुदेव🙏🙏🙏

    • AMIT SHUKLA says:

      AAPKE NAAM ME 2 LAGANE SE AAGE BADHOGE

    • Chandrashekhar sharma says:

      प्रणाम गुरुजी महाराज सादर चरण स्पर्श।।
      ऐसा ज्ञान तो गुरु शिष्य परंपरा में प्रदत्त मंत्र के जप से ही संभव।।
      जय श्री गुरु जी महाराज।।

  2. Deepak says:

    जय हो गुरुदेव

  3. Yadavv muukesh says:

    लेख शत प्रतिशत सत्य है गुरुदेव🙇🙏

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