मन ही घोड़ा है। हम वहीं वहीं जाते हैं, जहाँ जहाँ यह मन हमें ले जाता है। लगाम सही से न संभाली जाए, विवेक पूर्वक न चला जाए, तो यह अपनी मर्जी से चलता है। यह मन नाम का घोड़ा है बहुत बढ़िया, बड़े काम का है, चलता भी बड़ा तेज है। पर इसका लाभ तब है जब इसकी दिशा ठीक हो। जहाँ यह जाना चाहे, वहाँ न जाता हो। जिस ओर जाना चाहिए, उस ओर जाए या यह भी वहीं जाना चाहने लगे जहाँ जाना चाहिए, जहाँ हमारी मंजिल है। नहीं तो हमारे साथ भी यही होता है जो इस कहानी में उस घुड़सवार के साथ हुआ। मन की दिशा ठीक न रहे तो यह हमें परमात्मानन्द रूपी लक्ष्य तक पहुँचाने की जगह, दुख के, पाप के, वासना के कीचड़ में पहुँचा देता है। कहाँ जाता है कि तब पगड़ी तो उतर ही जाती है, मुंह अलग काला होता है। जगत में जन्म मरण की कैद होती है और माया नचा नचा कर जुर्माना अलग वसूलती है।

admin

Mantra gyan

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4 Responses

  1. Khushal trivedi says:

    बिल्कुल सत्य👌🙏

  2. जितेन्द्र झा 'गुड्डू' says:

    🙏🙏🙏🙏🙏

  3. pankaj says:

    मन को काबू नही किया जा सकता है केवल दिशा दी जा सकती है संस्कारों की l

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