शयन विधान
शयन विधान :
हमारी दिनचर्या का महत्वपूर्ण अंग है शयन। शयन अर्थात सोना, नींद लेना। मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी शयन करते हैं। शयन किस तरह हमारे स्वास्थ्य और चेतना के लिए लाभदायी हो सकता है, इसके लिए शास्त्रों में निर्देश दिए गए हैं। रात्रि को भोजन करने के तत्काल बाद शयन नहीं करना चाहिए , सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना चाहिए।
सोने की मुद्रा : “ उल्टा सोये भोगी, सीधा सोये योगी, डाबा सोये निरोगी, जीमना सोये रोगी।“
आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं, बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं। बाईं करवट सोने की धारणा के पीछे भी वैज्ञानिक आधार है। दरअसल यह प्रक्रिया स्वर विज्ञान पर आधारित है। हमारी नाक से जो श्वास बाहर निकलती और अन्दर आती है उसे स्वर कहते हैं। नाक के बाएं छिद्र से श्वास लेने व छोड़ने की क्रिया को चन्द्र स्वर कहते हैं। इसी तरह दाहिनी ओर का स्वर सूर्य स्वर कहलाता है। सूर्य स्वर हमारे शरीर में उष्मा उत्पन्न करता है। इससे भी भोजन पचने में मदद मिलती है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में बाईं करवट सोने को कहा गया है। शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।
सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र /नवकार मंन्त्र गिने जाए :-
“सूतां सात, उठता आठ” अर्थात सोते वक्त सात भय [सात भय: – इहलोक, परलोक,आदान,अकस्मात,वेदना,मरण, अश्लोक (भय)]को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।
दिशा घ्यान:-
- सोते समय हमारे पैर दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए यानी उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर नहीं सोना चाहिए। यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है। पूर्व या दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोना चाहिए। इन दिशाओं में सिर रखकर सोने से लंबी आयु प्राप्त होती है और स्वास्थ्य भी उत्तम रहता है। इसके विपरीत उत्तर या पश्चिम दिशा में सिर रखकर सोने से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है। दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं ।
- पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर सिर करके क्यों सोना विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है जो अनेक बीमारियों को दूर रखती है। सौर जगत धु्रव पर आधारित है। ध्रुव के आकर्षण से दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रगतिशील विद्युत प्रवाह हमारे सिर में प्रवेश करता है और पैरों के रास्ते निकल जाता है। ऐसा करने से भोजन आसानी से पच जाता है। सुबह-सवेरे जब हम उठते हैं तो मस्तिष्क विशुद्ध वैद्युत परमाणुओं से परिपूर्ण एवं स्वस्थ हो जाता है। इसीलिए सोते समय पैर दक्षिण दिशा की ओर करना मना किया गया है।
यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।
1:- पूर्व (E) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।
2:-दक्षिण (S) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।
3:-पश्चिम (W) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।
4:-उत्तर (N) में मस्तक रखकर सोने से मृत्यु और हानि होती है ।
अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है,विशेष शयन की सावधानियाँ:-
1:- मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।
2:- सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।
3:- संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।
4:- शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।
5:- द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।
6:- ह्रदय पर हाथ रखकर, छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
7:- सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।
7:- पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।
8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान)
9:- सोते सोते पढना नहीं।
10:- सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले चेत जाएँ)
11:- ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है।)
12:- शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।

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