कुल देवी /देवता नाराज नाही होते
भगवान कोई व्यक्ति नहीं है जो रुष्ट होगा, भगवान को मनुष्य से भी कोई कार्य नहीं जो रुस्ट हो, भगवान का कोई कार्य भी शेष नहीं है जो कोई व्यक्ति पूर्ण कर दे, भगवान की देह भी नहीं है वह आपसे कुछ मांग लें, भगवान एक ऊर्जा है उसके खरबों रूप हैँ जिनको हम विभिन्न रूपों के नाम से जानते हैँ,भगवान सिर्फ पुण्य है,भगवान एक ऊर्जा है तो वह आपसे रुष्ट क्यों होगा, भगवान ने सृस्टि रचने से पहले ही अपने सभी कार्य पूर्ण कर दिए ये ब्रह्माण्ड उसका प्रमाण है।
हमारा जन्म पूर्व जन्म के कर्म आधारित होता है जो कर्म हम पूर्व जन्म में कर करते हैं उसी आधार पे यह जन्म है उसी आधार पे जीवन चलता है शुभ कर्म किये होते हैं तो सुख पूर्वक जीवन जीते हैं शुभ अशुभ कर्म किये होते हैं तो शुभ अशुभ समय आता है उसी अशुभ को दग्द करने के लिए देवत्य उपासना है।
जब हम किसी भी देवता के शरणागत हो उसके मंन्त्र का जप करते हैं तो वह ब्रह्मांड में स्फुरित होता है और उसी देवता के रूप के अणु एकत्र करने लगता है और शैने शैने पाप दग्द होने लगते हैं और नवकर्म का निर्माण होने लगता है जो शुभ फल देने लगता है इस लिए शुभ कर्म करें ईश्वर के प्रति आस्था रखते हुए शुभ कर्म करें निश्चित ही शुभ फल मिलेगा दुख दूर होंगे।
यह भी समझना जरूरी है की देबताओ का कोनसा रूप सुख कारी है और मोक्ष तक ले जॉयेगा कोनसा रूप सिर्फ पाप काट के सिर्फ मोक्ष ही देगा और कोनसे मंन्त्र कीलित हैं कोनसे प्रयोगिग हैं कोनसे मंन्त्र करने का विधान क्या है उससे क्या क्या लाभ हैं
मंन्त्र एक विज्ञान है जिस तरह से किसी भी वस्तु को बनाने के लिए अलग अलग पार्ट जोड़ के बनाते हैं वही किर्या मंन्त्र की है फर्क यह है भौतिक चीजें सामने होती हैं उंनको हम हाथ से बनाते हैं और मंन्त्र शूक्ष्म जगत से जो चाहते हैं उस वस्तु का शुक्ष्म रूप निर्माण करता है और उसका तरीका अलग अलग तरह से कार्य करता है
अशोक भारद्वाज द्वारा
मंन्त्र हम अपनी इच्छा पूर्ति के लिए करते हैं जब मंन्त्र स्फुरित होता है वह वायुमंडल में तैरता है और उस मंन्त्र से सम्बंधित अणु एकत्र होने सुरु होते हैं जब मंन्त्र कि एक निश्चित मात्रा हो जाती है तब उस मंन्त्र से सम्बंधित रूप तैयार हो जाता है वह शुक्ष्म रूप जिस इच्छा पूर्ति के लिए जपा उससे सम्बन्धित वातावरण उपासक के चारो ओर बनाता है इसी के माध्यम से हमारी इच्छा पूर्ति होती है

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