कालसर्प योग : वरदान या श्राप

कालसर्प योग: वरदान या श्राप
कालसर्प योग आजकल का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन चूका है क्यूंकि इस विषय से सम्बंधित पूर्ण जानकारी न होने के कारण यह एक नकारात्मक योग की श्रेणी में आता है ! यह कोई जरुरी नहीं है कि हमेशा इस योग का नकारात्मक प्रभाव ही होता है कभी- कभी इस योग का सकारत्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है ! यह सब ग्रहो की स्थिति पर निर्भर करती है !
कुछ ज्योतिष दैवेज्ञ इसको ” पितृदोष ” भी समझते है उनका मानना है की किसी जातक की कुंडली में कालसर्प योग है तो यह मानकर चलिए कि परिवार के अन्य सदस्यों के जन्मांग में भी यह योग देखने को मिलता है ; क्यूंकि यह अनुबंधित ऋण है , जो हमें पूर्वजो से मिलता है एवं इससे परिवार के सभी सदस्य किसी न किसी रूप में प्रभावित होते है ! इसे ही पितृ दोष का नाम दिया जाता है !
व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान ही तो रहता है , मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक एवं शारीरिक क्षति होती रहती है। तरह तरह कि बीमारिया घेरे रहती हैं। उस जातक का जीवन असाधारण होता है। उसके जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे जाते है।
इस लेख में हम कालसर्प से सम्बंधित एवं जुडी बातें जैसे कि कालसर्प योग (परिभाषा )क्या है , कालसर्प योग के प्रकार , कालसर्प योग के लक्षण , कालसर्प योग का खंडन या भंग, भावो के अनुसार कालसर्प योग निवारण के उपाय, कालसर्प शांति के तीर्थ स्थान आदि पर चर्चा करेंगे !
परिभाषा : कालसर्प योग राहु से केतु एवं केतु से राहु कि ओर बनने वाला योग है ! अगर वैज्ञानिक रूप से यदि कालसर्प कि व्याख्या करे तो जन्मांग चक्र में राहु – केतु कि स्थिति हमेशा आमने – सामने (180°डिग्री) की होती है ! जब अन्य सभी ग्रह इनके (राहु – केतु ) मध्य अर्थात इन दोनों के प्रभाव क्षेत्र में आ जाते है , तब वे अपने प्रभाव त्याग कर राहु -केतु के चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते है एवं राहु – केतु के गुण – दोषो का प्रभाव अन्य ग्रहो पर स्वाभाविक हो जाता है ! राहु – केतु हमेशा वक्री गति से चलते है ! राहु – केतु को छाया ग्रह भी कहते है ! उतरी ध्रुव की इस छाया का नाम ही राहु है और दक्षणि ध्रुव की इस छाया का नाम केतु है।
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार छायाग्रहों (अर्थात दिखाई न देने वाले ग्रह) राहू और केतु के कारण कुण्डली में बनने वाले योगो में से एक ऐसा योग है, जो कालसर्प योग के नाम से विख्यात और प्रसिद्द है । कालसर्प योग का निर्माण तब होता है जब जातक की कुंडली में सारे ग्रह (अर्थात सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) राहु और केतु के मध्य होते है .
“राहु केतु मध्ये सप्तो विध्न हा काल सर्प सारिक:।
सुतयासादि सकलादोषा रोगेन प्रवासे चरणं ध्रुवम।।”
इस योग का नाम कालसर्प योग ही क्यों रखा गया है, क्यूंकि यहाँ पर काल से अभिप्राय है “समय” जिसको हम कालचक्र से भी जानते है और वहीँ सर्प से अभिप्राय है “कर्म” येहि सृष्टि का नियम है इस सन्दर्भ में एक प्रसिद्द श्लोक इस प्रकार है :
“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
अर्थ- कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके अनुसार परिणाम भी देती, सम्पूर्ण सृष्टि कर्म के कालचक्र से बंधी और जुडी हुई है !
मान्यता है कि कालसर्प योग का परिलक्षित होना उस जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य पाप या अपराध या श्राप के फलस्वरूप उसकी कुंडली में होता है ! किन्तु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। इस योग का प्रभाव जातक कि कुंडली में ग्रहो कि स्थिति पर निर्भर करती है कि ग्रह किस भाव में कौन सी राशि में अवस्थित है और उसमें कौन-कौन से ग्रह कहां बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है इन सारी बातो का आंकलन करने पर ही किसी निर्णय को लिया जाता है ! इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। यह कोई जरुरी नहीं है कि हमेशा इस योग का नकारात्मक प्रभाव होता है कभी- कभी इस योग में जन्मे जातक दुनिया कि उस ऊंचाई पर होते है जहाँ पर पहुंचना किसी साधारण जातक के लिए असंभव है !
हमारा निरंतर प्रयास यही रहता है कि हम लेख से सम्बंधित सटीक एवं विश्वसनीय जानकारी आप सभी तक पहुंचाते रहे,” यही हमारा उद्देश्य और यही हमारी कामना है !”
TO BE CONTINUED…………

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